उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chiz rakhte hi dham se girti hai

चीज़ रखते ही धम से गिरती है

چیز رکھتے ہی دھم سے گرتی ہے

शायर: Lucky farooqi Hasrat8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चीज़ रखते ही धम से गिरती है
'इश्क़ की मेज़ आड़ी-तिरछी है

मेरे नज़दीक माँ की डाँट-डपट
गर्म रोटी पे घी के जैसी है

जिस को पलकों पे होना चाहिए था
फूँकनी और तवे में उलझी है

मौत धोबी है और उमीद हयात
मैले कपड़ों की एक गठरी है

खेल जारी है सर्द रातों का
मैं हूँ जल्वे हैं और अँगीठी है

हाथ बेटी का किस को सौंपे माँ
कई मटके हैं इक घड़ौंची है

चख के दोनों को ये हुआ मा'लूम
होंट मीठे हैं चाय फीकी है

पस-ए-पर्दा हैं लड़कियाँ सारी
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