उर्दू शायरी · ग़ज़ल

du’a-e-KHair ki phir kya kami hai

दु’आ-ए-ख़ैर की फिर क्या कमी है

دعائے خیر کی پھر کیا کمی ہے

शायर: Lucky farooqi Hasrat9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दु’आ-ए-ख़ैर की फिर क्या कमी है
दु’आ-गो जब हुसैन इब्न-ए-‘अली है

जिसे कहती है ये दुनिया क़नाअ'त
वो हम फ़ाक़ा-कशों की दस्तरी है

है ठंडी राख का चूल्हा रे’आया
हुकूमत काठ की इक देगची है

है कुछ मेरी तबी'अत भी शगुफ़्ता
वो लड़की भी ज़रा सी चुलबुली है

हैं रक़्साँ टोकरी को देख लहरें
ये ठाकुर जी की पहली आरती है

कई नेताओं से चक्कर है उस का
सहाफ़त बद-चलन औरत है जी है

मिरा परदेस जाना तय है यारो
ग़रीबी दौर-ए-नौ की कैकई है

न इन होंटों में रस है पहले जैसा
न बाखर-ख़ानियों में चाशनी है

मिरी आँखों के कान उक्ता गए हैं
तिरी तस्वीर कितना बोलती है