उर्दू शायरी · ग़ज़ल

marham ke nahin hain ye taraf-dar namak ke

मरहम के नहीं हैं ये तरफ़-दार नमक के

مرہم کے نہیں ہیں یہ طرف دار نمک کے

शायर: Varun Anand6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मरहम के नहीं हैं ये तरफ़-दार नमक के
निकले हैं मिरे ज़ख़्म तलबगार नमक के

आया कोई सैलाब कहानी में अचानक
और घुल गए पानी में वो किरदार नमक के

दोनों ही किनारों पे थी बीमारों की मज्लिस
इस पार थे मीठे के तो उस पार नमक के

उस ने ही दिए ज़ख़्म ये गर्दन पे हमारी
फिर उस ने ही पहनाए हमें हार नमक के

कहती थी ग़ज़ल मुझ को है मरहम की ज़रूरत
और देते रहे सब उसे अशआ'र नमक के

जिस सम्त मिला करती थीं ज़ख़्मों की दवाएँ
सुनते हैं कि अब हैं वहाँ बाज़ार नमक के