उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mar ke bhi qamat-e-mahbub ki ulfat na gai

मर के भी क़ामत-ए-महबूब की उल्फ़त न गई

مر کے بھی قامت محبوب کی الفت نہ گئی

शायर: Jalal Lakhnavi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मर के भी क़ामत-ए-महबूब की उल्फ़त न गई
हो चुका हश्र भी लेकिन ये क़यामत न गई

शब को मय ख़ूब सी पी सुब्ह को तौबा कर ली
रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई

बोसा ले कर जो मुकरता हूँ तो वो कहते हैं
शाइ'री का असर और झूट की आदत न गई

दाग़ मिटते न सुना दिल से तिरी हसरत का
आई जिस घर में फिर उस घर से ये दौलत न गई

पास बैठे भी तो क्या जल्द उठे घबरा कर
मेरा सौदा तो गया आप की वहशत न गई

न हुआ साफ़ दिल-ए-यार किसी तरह 'जलाल'
ख़ाक में मिल गए हम उस की कुदूरत न गई