उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main yun to nahin hai ki mohabbat mein nahin tha

मैं यूँ तो नहीं है कि मोहब्बत में नहीं था

میں یوں تو نہیں ہے کہ محبت میں نہیں تھا

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं यूँ तो नहीं है कि मोहब्बत में नहीं था
अलबत्ता कभी इतनी मुसीबत में नहीं था

अस्बाब तो पैदा भी हुए थे मगर अब के
उस शोख़ से मिलना मिरी क़िस्मत में नहीं था

तय मैं ने किया दिन का सफ़र जिस की हवस में
देखा तो वही रात ज़ियाफ़त में नहीं था

इक लहर थी ग़ाएब थी जो तूफ़ान-ए-हवा से
इक लफ़्ज़ था जो ख़त की 'इबारत में नहीं था

कैफ़िय्यतें सारी थीं फ़क़त हिज्र तक उस के
मैं सामने आ कर किसी हालत में नहीं था

बदले गए एहसास के अंदाज़ ही अब के
दरिया का बयाँ दिल की हिकायत में नहीं था

बे-रब्त सा इक शोर रहा शह्र में कुछ दिन
मैं था भी यहाँ पर तो हक़ीक़त में नहीं था

लग़्ज़िश हुई कुछ मुझ से भी तुग़्यान-ए-तलब में
कुछ वो भी 'ज़फ़र' अपनी तबी'अत में नहीं था