उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main pahli bar is jangal se guzra tha to sab aisa nahin tha

मैं पहली बार इस जंगल से गुज़रा था तो सब ऐसा नहीं था

میں پہلی بار اس جنگل سے گزرا تھا تو سب ایسا نہیں تھا

शायर: Yawar Azeem6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं पहली बार इस जंगल से गुज़रा था तो सब ऐसा नहीं था
यहाँ कुछ कुछ परिंदे बोलने वाले थे सन्नाटा नहीं था

मोहब्बत ने मुझे क़ैद-ए-अनासिर से बहुत आगे बुलाया
मगर मैं अपनी मिट्टी के शिकंजे से निकल पाया नहीं था

ये तू ने किस लिए आँचल पे ताज़ा ख़्वाहिशों के फूल काढ़े
तिरे पल्लू से क्या बाँधा हुआ वो रेशमी वा'दा नहीं था

ब-क़द्र-ए-आरज़ू मेरा समुंदर से त'अल्लुक़ था न लेकिन
मैं उथले पानियों से अपना रिश्ता जोड़ने वाला नहीं था

मिरी तक़दीर में कुछ सरफ़राज़ी के हरे लम्हे लिखे थे
नुमू पाते ही जो पामाल हो जाए मैं वो सब्ज़ा नहीं था

ख़मोशी बर्फ़ की मानिंद होंटों पर जमी रहती थी 'यावर'
गुलाबी लफ़्ज़ के बाहर निकलने का कोई रस्ता नहीं था