उर्दू शायरी · ग़ज़ल

maine rishton se na baDh kar kabhi paisa samjha

मैं ने रिश्तों से न बढ़ कर कभी पैसा समझा

میں نے رشتوں سے نہ بڑھ کر کبھی پیسہ سمجھا

शायर: Tahir Saood Kiratpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं ने रिश्तों से न बढ़ कर कभी पैसा समझा
तू ने पैसों से न बढ़ कर कभी रिश्ता समझा

बाप समझा तो किसी ने मुझे दादा समझा
माँ ने लेकिन मुझे हर हाल में बच्चा समझा

प्यार था जिस में उसी आँख ने ख़ूबी देखी
वर्ना दुनिया ने न जाने मुझे क्या क्या समझा

हर गली चौक पे रोया मैं ग़म-ए-दिल के सबब
मिरे जज़्बात को समझा तो परिंदा समझा

देखते देखते वो हो गया सच का क़ातिल
मैं ने जिस शख़्स को हर हाल मैं सच्चा समझा

घर के अंदर कई अफ़राद सियासत-दाँ थे
भाई बेटा न समझ कर मुझे मोहरा समझा

उस की क्यों सादा-मिज़ाजी पे न मर जाऊँ 'सऊद'
कम भी पाया तो उसे उस ने ज़ियादा समझा