उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main ek ajib-o-gharib manzil ki justuju mein laga hua hun

मैं इक 'अजीब-ओ-ग़रीब मंज़िल की जुस्तुजू में लगा हुआ हूँ

میں اک عجیب و غریب منزل کی جستجو میں لگا ہوا ہوں

शायर: Tahir Saood Kiratpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं इक 'अजीब-ओ-ग़रीब मंज़िल की जुस्तुजू में लगा हुआ हूँ
इसी लिए सब तमाश-बीनों का इक तमाशा बना हुआ हूँ

क़दम क़दम पर जो मेरी ग़ैरत से खेलते हो कि इस का मतलब
चलो असीर-ए-वफ़ा सही मैं तो क्या तुम्हारा दबा हुआ हूँ

बड़े जतन से लिखा गया था फिर उस पे बरसों पढ़ा गया था
मगर मैं ख़ुश-बख़्त ख़त न ठहरा जो यूँ सड़क पर पड़ा हुआ हूँ

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के पेच-ओ-ख़म सब निकाल सकता हूँ दो घड़ी में
पढ़ा लिखा कम सही मगर मैं ख़याल रखना गिना हुआ हूँ

मैं उस का ग़म यूँ मना रहा हूँ उसे ख़ुदारा बताए कोई
कि ग़म लतीफ़े सुना रहे हैं मैं मुँह बनाए खड़ा हुआ हूँ

इसे कोई क्या शिकस्त लिक्खे और इस को क्या कोई जीत लिक्खे
किसी के आगे झुका हुआ हूँ किसी के आगे तना हुआ हूँ

जहान-ए-फ़ानी के मालदारो तुम्हारी दुनिया तुम्हें मुबारक
मुझे नहीं तुम ख़रीद सकते मुझे न छेड़ो बिका हुआ हूँ