उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main gum hun aap apni justuju mein bhare hue rup rang-o-bu ka

मैं गुम हूँ आप अपनी जुस्तुजू में भरे हुए रूप रंग-ओ-बू का

میں گم ہوں آپ اپنی جستجو میں بھرے ہوئے روپ رنگ و بو کا

शायर: Ijtiba Rizvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं गुम हूँ आप अपनी जुस्तुजू में भरे हुए रूप रंग-ओ-बू का
ज़वाल की मेरे दास्ताँ है जिसे फ़साना कहें नुमू का

तुम्हारी गर जुस्तुजू न करते तो हम जहाँ थे वहीं पे तुम थे
हम अपनी मंज़िल से बढ़ गए हैं बुरा हो इस ज़ौक़-ए-जुस्तुजू का

मिरी मोहब्बत की इंतिहा थी मिरे तख़य्युल की बुत-तराशी
बिखर गई आरज़ू की पूँजी तिलिस्म टूटा जो रंग-ओ-बू का

तलब के सहरा का ज़र्रा-ज़र्रा है ख़ंदा-ज़न सई-ए-राएगाँ पर
सुला दे अब ऐ नसीम-ए-ग़फ़लत कि थक गया पाँव जुस्तुजू का

तिरी तमन्ना न सह सकेगी मलामत-ए-शर्म-ए-ना-रसाई
ख़ुद अपने दामन को तू झुका दे कि थाम ले हाथ आरज़ू का

बला हुई हम को अपनी जुरअत अगरचे हक़दार भी हमीं थे
चुरा के ले आए मय-कदे से जो बार उठने लगा सुबू का

तुम्ही कहो क्या ये सच नहीं है कि तुम ने चाहा तो हम ने चाहा
हमारा सज्दा तो इक करिश्मा है इल्तिफ़ात-ए-बहाना-जू का

लिबास जो ज़िंदगी ने बख़्शा उसे किया हम ने पारा-पारा
हमारी दीवानगी को 'रिज़वी' इशारा काफ़ी था एक हू का