उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chheDa hi kyon hawa-e-rah-e-ku-e-yar ne

छेड़ा ही क्यों हवा-ए-रह-ए-कू-ए-यार ने

چھیڑا ہی کیوں ہوائے رہ کوئے یار نے

शायर: Ijtiba Rizvi19 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

छेड़ा ही क्यों हवा-ए-रह-ए-कू-ए-यार ने
अंधेर कर दिया मिरी मुश्त-ए-ग़ुबार ने

इक अख़्गर-ए-जमाल फ़रोज़ाँ ब-शक्ल-ए-दिल
फेंका इधर भी हुस्न-ए-तजल्ली-निसार ने

अफ़्सुर्दगी भी हुस्न है ताबिंदगी भी हुस्न
हम को ख़िज़ाँ ने तुम को सँवारा बहार ने

इस दिल को शौक़-ए-दीद में तड़पा के कर दिया
क्या उस्तुवार वा'दा-ए-ना-उस्तुवार ने

जल्वे की भीक दे के वो हटने लगे थे ख़ुद
दामन पकड़ लिया निगह-ए-ए'तिबार ने

गेसू ग़ुबार-ए-राह-ए-तमन्ना से अट न जाएँ
सहरा में आप निकले हैं हम को पुकारने

मुझ को चुना है बहर-ए-सितमहा-ए-इल्तिफ़ात
चश्म-ए-जफ़ा-शिआ'र-ओ-वफ़ा-ए'तिबार ने

बख़्शी हैं इस ख़ुदी को प-ए-इम्तिहान-ए-ज़र्फ़
परवरदिगारियाँ मिरे परवरदिगार ने

कब से किया है बाँध के एहराम-ए-बे-ख़ुदी
मेरा तवाफ़ गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार ने

हिम्मत पे मेरी प्यार से उमडा है क़ल्ब-ए-बहर
धोए हैं पाँव गिर्या-ए-अब्र-ए-बहार ने

सहन-ए-मजाज़ में ब-हज़ाराँ-हज़ार नाज़
खेली है मुझ से आँख-मिचौली बहार ने

दी है नज़र को दावत-ए-बोस-ओ-मस-ओ-कनार
कलियों के हुस्न-ए-पाक-ए-गुनह-इंतिज़ार ने

चंदें हज़ार आलम-ए-आशुफ़्तगी ब-दोश
उतरा है नाज़ ख़ुद मिरे गेसू सँवारने

इस जाम-ए-दिल को अपनी हथेली पे ले के ख़ुद
छलका दिया है साक़ी-ए-कौसर-निसार ने

रश्क-ए-दूई से वुसअ'त-ए-आग़ोश कर के तंग
भींचा है मुझ को वहदत-ए-कसरत-शिकार ने

जलवों ने रक़्स-ए-नाज़ किया है मिरे हुज़ूर
पर्दे उठा उठा दिए हैं पर्दा-दार ने

आग़ोश-ए-चून-ओ-चंद से झुँझला के एक बार
छीना मुझे हमेश्गी-ए-बे-कनार ने

मैं काफ़िर-ए-मजाज़-परस्त-ए-हक़-आश्ना
समझा कहाँ कहाँ से सदा दी है यार ने

दीवाना-वार कुफ़्र को ईमाँ किए हुए
दौड़ा तो साथ छोड़ दिया ए'तिबार ने