उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ahbab chhuTe mahbub chhuTe ghar chhuT gaya dar chhuT gaya

अहबाब छुटे महबूब छुटे घर छूट गया दर छूट गया

احباب چھٹے محبوب چھٹے گھر چھوٹ گیا در چھوٹ گیا

शायर: Ijtiba Rizvi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अहबाब छुटे महबूब छुटे घर छूट गया दर छूट गया
जब दिल से तमन्ना छूट गई सब रिश्ता नाता टूट गया

ऐ साक़ी-ए-बज़्म-ए-कैफ़-ए-हयात अब मुझ को प्यासा जाने दे
मय जिस में मिरी तक़दीर की थी वो शीशा तुझ से टूट गया

गो शीशा-गर-ए-क़ुदरत ने बहुत टूटे हुए शीशे जोड़ दिए
लेकिन ये हमारा शीशा-ए-दिल जोड़ा न गया यूँ टूट गया

इस साज़ पे नग़्मा अब छेड़ो तो नाला पैदा होता है
मौजूद हैं वो सब तार जो थे बस एक नहीं है टूट गया

हम रोते हैं अपने प्यारों को और फ़ितरत हम से कहती है
अब और खिलौनों से खेलो जो टूट गया सो टूट गया

वो राह में है आँखों में है दम ऐ बाद-ए-सबा आहिस्ता गुज़र
हैं तार-ए-नफ़स पर हचकोले अब टूट गया अब टूट गया

कहते हो कि माँगो जो माँगो बतलाओ तुम्ही हम क्या माँगें
चाहा था कि माँगें तुम से तुम्हें ये हो न सका जी छूट गया

हाँ सुन कि तुझे थी हम से ग़रज़ मोहताज-ए-नज़र था हुस्न तिरा
रक्खी रही शान-ए-इस्तिग़ना आख़िर को ये भांडा फूट गया

ये दिल तो वही दिल है 'रिज़वी' आबाद भी था वीरान भी है
अरमानों की इस बस्ती को कल एक मुसाफ़िर लूट गया