उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bhigi bhigi ghaTaen uThin dhimi dhimi phuwaren aain

भीगी भीगी घटाएँ उठीं धीमी धीमी फुवारें आईं

بھیگی بھیگی گھٹائیں اٹھیں دھیمی دھیمی پھواریں آئیں

शायर: Ijtiba Rizvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

भीगी भीगी घटाएँ उठीं धीमी धीमी फुवारें आईं
रफ़्ता रफ़्ता तमन्ना जागी चुपके चुपके बहारें आईं

ज़िक्र-ओ-फ़िक्र में कुछ दिन झूले होश नहीं अब हैं वो झकोले
आगे रिम-झिम रिम-झिम बूँदें और पीछे बौछारें आईं

आलम-ए-शौक़ से उन का क़ैदी तौक़-ओ-सलासिल पहने आया
काँपे 'अर्श के पाए जब ज़ंजीरों की झंकारें आईं

मुद्दत से सैलाब बने वो बुनियादों को खोद रहे थे
टूटने पर अब दैर-ए-ख़ुदी की पथरीली दीवारें आईं

दोनों जहाँ की सारी पूँजी बार हुई है जिन नाक़ों पर
मर्द-ए-गदा के हाथ में क्यूँकर उन नाक़ों की महारें आईं

तेरे फ़क़ीर को रस्ता चलते इज़्ज़त-ओ-ज़िल्लत में उलझाने
मंदिर से पूजाएँ दौड़ीं मस्जिद से फटकारें आईं

गोश-ए-अर्श का बोसा लेने दहर से उठ कर बारी बारी
काफ़िर की फ़रियादें आईं ग़ाज़ी की ललकारें आईं

उस की अपनी फ़ितरत जीती मेरे गुनाह पे रहमत बरसी
जैसे माँ की छाती उमडी जैसे दूध की धारें आईं