उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main bhi be-ant hun aur tu bhi hai gahra sahra

मैं भी बे-अंत हूँ और तू भी है गहरा सहरा

میں بھی بے انت ہوں اور تو بھی ہے گہرا صحرا

शायर: Iftikhar Mughal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं भी बे-अंत हूँ और तू भी है गहरा सहरा
या ठहर मुझ में या ख़ुद में मुझे ठहरा सहरा

रूह में लहर बनाते हैं तिरी लहरों से
और कुछ देर मिरे सामने लहरा सहरा

आँख झपकी थी बस इक लम्हे को और इस के ब'अद
मैं ने ढूँडा है तुझे ज़िंदगी सहरा सहरा

अपनी हस्ती को बिखरने से बचा लेना तुम
मुझ पे मत जाना मिरी जान मैं ठहरा सहरा

मेरे लहजे का समुंदर ही नहीं सूखा है
लुट गया तेरी हँसी का भी सुनहरा सहरा