उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi kabhi to ye haalat bhi ki mohabbat ne

कभी कभी तो ये हालत भी की मोहब्बत ने

کبھی کبھی تو یہ حالت بھی کی محبت نے

शायर: Iftikhar Mughal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी कभी तो ये हालत भी की मोहब्बत ने
निढाल कर दिया मुझ को तिरी मोहब्बत ने

तिरी ये पहली मोहब्बत है तुझ को क्या मालूम
घुला दिया मुझे इस आख़िरी मोहब्बत ने

वो यूँ भी ख़ैर से सरमा का चाँद थी लेकिन
उसे उजाल दिया और भी मोहब्बत ने

मुझे ख़ुदा ने अधूरा ही छोड़ना था मगर
मुझे बना दिया इक शख़्स की मोहब्बत ने

ये तुम जो मेरे लिए ख़्वाब छोड़ आई हो
तुम्हें जगाया तो होगा मिरी मोहब्बत ने

मैं जिस को पहले पहल दिल-लगी समझता था
मुझे तो मार दिया इस नई मोहब्बत ने

ये अपने अपने नसीबों की बात है वर्ना
किसी को 'मीर' बनाया इसी मोहब्बत ने

ये जिस्म-ओ-जान ये नाम-ओ-नुमूद हस्ब-ओ-नसब
ये सारे वहम थे इज़्ज़त तो दी मोहब्बत ने

मोहब्बत और इबादत में फ़र्क़ तो है नाँ
सो छीन ली है तिरी दोस्ती मोहब्बत ने