उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main ajnabi raha sab se magar sabhi mein raha

मैं अजनबी रहा सब से मगर सभी में रहा

میں اجنبی رہا سب سے مگر سبھی میں رہا

शायर: Aabid Jafri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं अजनबी रहा सब से मगर सभी में रहा
ये हौसला भी यहाँ पर किसी किसी में रहा

क़बा-ए-अज़्मत-ए-इंसाँ मिली फ़क़ीरों को
फ़क़ीह-ए-शहर तो क्या क्या न सरवरी में रहा

खिंचा है ज़ख़्म-ए-अदावत से दोस्ती का लहू
जिसे अज़ीज़ रखा जाँ से दुश्मनी में रहा

चराग़ रख दिए सूरज के सामने ला कर
मगर वो फ़र्क़ न जाना जो रौशनी में रहा

ज़बान खुलती तो होता क़दम क़दम मक़्तल
सुकूत ख़ौफ़ की सूरत गली गली में रहा