उर्दू शायरी · ग़ज़ल

manus-e-iztirab tha waqf-e-gudaz tha

मानूस-ए-इज़्तिराब था वक़्फ़-ए-गुदाज़ था

مانوس اضطراب تھا وقف گداز تھا

शायर: Jaleel Qidwai8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मानूस-ए-इज़्तिराब था वक़्फ़-ए-गुदाज़ था
ये दिल अज़ल से नज़्र-ए-सितम-हा-ए-नाज़ था

मैं महव-ए-अस्ल था न असीर-ए-मजाज़ था
इक राज़ था कि महव-ए-तमाशा-ए-राज़ था

जिस वक़्त मेरे सामने वो मस्त-ए-नाज़ था
आँखों में इक सुरूर जिगर में गुदाज़ था

आगाह ख़ुद न अपनी हक़ीक़त से हो सका
मैं भी 'अजीब 'आलम-ए-हस्ती का राज़ था

लर्ज़िश में जिस के नूर से थी सारी काएनात
वो दिल में अपने बन के ग़म-ए-जाँ-गुदाज़ था

दिल ने तड़प के कर दिए तय सारे मरहले
मैं मुब्तला-ए-कश्मकश-ए-ज़ब्त-ए-राज़ था

क़िस्मत से अपनी ख़ाक-बसर फिर है आज-कल
वो दिल जो बारयाब-ए-शबिस्तान-ए-नाज़ था

मर कर भी कश्मकश से फ़राग़त न मिल सकी
कितना 'जलील' सिलसिला-ए-ग़म दराज़ था