उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mana gul-o-gulzar pe ranai wahi hai

माना गुल-ओ-गुलज़ार पे रा'नाई वही है

مانا گل و گلزار پہ رعنائی وہی ہے

शायर: Zafar Iqbal9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

माना गुल-ओ-गुलज़ार पे रा'नाई वही है
मंज़र तो बदल दे कि तमाशाई वही है

उजड़ा था अभी कल ही तमन्नाओं का बाज़ार
और आज यहाँ ज़ीनत-ओ-ज़ेबाई वही है

चूमा है यहाँ मैं ने हर आवाज़ का चेहरा
इन गूँजती गलियों से शनासाई वही है

ख़ुश्बू की तरह उड़ के पहुँचती है ख़बर भी
हर-चंद नया शह्र है रुस्वाई वही है

अगली सी मिरी आँख में बीनाई नहीं वो
ऐ आब-ए-तमाशा तिरी गहराई वही है

हलचल न हुई गाँव के तालाब में इक दिन
ठहरा हुआ पानी है वही काई वही है

दरयाफ़्त हुईं दह्र में क्या क्या न ज़मीनें
इस दिल को मगर दा'वा-ए-यकताई वही है

इस धूप में इक सोच का साया रहा सर पर
उट्ठी है जो अन्दर से घटा छाई वही है

कहता हूँ 'ज़फ़र' शे'र तो सहता हूँ बदन पर
तन्हाई वही क़ाफ़िया-पैमाई वही है