उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mail-ba-dosti wo kidhar hai kidhar nahin

माइल-ब-दोस्ती वो किधर है किधर नहीं

مائل بہ دوستی وہ کدھر ہے کدھر نہیں

शायर: Zafar Akbarabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

माइल-ब-दोस्ती वो किधर है किधर नहीं
अल्लाह जानता है मुझे कुछ ख़बर नहीं

हर-चंद कुछ भी दूरी-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र नहीं
इक दूसरे से फिर भी मगर बा-ख़बर नहीं

हर सतह-ए-रंग से है मज़ाक़-ए-नज़र बुलंद
जल्वा यहाँ कोई भी ब-क़द्र-ए-नज़र नहीं

अन-देखी मंज़िलों का है इस आइने में अक्स
ये मेरा दिल है संग-ए-सर-ए-रहगुज़र नहीं

छा जाए लाख चाँद सितारों पे आदमी
कुछ भी नहीं जो वुसअ'त-ए-क़ल्ब-ओ-नज़र नहीं

दामन ग़ुबार से न बचाओ मुसाफ़िरो
सरमाया-ए-सफ़र है ये गर्द-ए-सफ़र नहीं

सुसताए क्या 'ज़फ़र' कोई राह-ए-हयात में
वो धूप है कि छाँव किसी मोड़ पर नहीं