उर्दू शायरी · ग़ज़ल

log jab jab teri aankhon mein KHuda dekhte hain

लोग जब जब तिरी आँखों में ख़ुदा देखते हैं

لوگ جب جب تری آنکھوں میں خدا دیکھتے ہیں

शायर: Umar Khaleeq Azmi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लोग जब जब तिरी आँखों में ख़ुदा देखते हैं
हम दर-ए-मक्र सभी ख़ल्क़ पे वा देखते हैं

चँद पैसों के सिवा हुस्न-ओ-तकल्लुफ़ के बिना
और अब इश्क़-ओ-ख़राबात में क्या देखते हैं

इश्क़ में कैसी रिवायत है कि सब के आशिक़
दर्द ख़ुद देते हैं फिर सू-ए-दवा देखते हैं

ख़्वाह-मख़ाह देते हैं दुश्नाम ज़माने वाले
जब भी मजनूँ किसी लैला पे फ़िदा देखते हैं

वस्ल के बा'द मिली हिज्र की इस वहशत में
हम कभी तुम को कभी बाद-ए-सबा देखते हैं