उर्दू शायरी · ग़ज़ल

larazte TuTte girte hue jahan se nikal

लरज़ते टूटते गिरते हुए जहाँ से निकल

لرزتے ٹوٹتے گرتے ہوئے جہاں سے نکل

शायर: Qamar Raza Shahzad5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लरज़ते टूटते गिरते हुए जहाँ से निकल
ज़ियादा ख़ौफ़-ज़दा है तो इस मकाँ से निकल

हमारे दिल का तअ'ल्लुक़ नहीं ज़माने से
सौ अपनी ख़्वाहिश-ए-दुनिया उठा यहाँ से निकल

तिरे जमाल की लौ तेरे बा'द रह जाए
दिए जलाता हुआ इस जहान-ए-जाँ से निकल

मैं रब के नूर से महव-ए-कलाम हूँ सर-ए-शाम
सू-ए-चराग़-ए-दुआ तू भी दरमियाँ से निकल

अब इस के बा'द क़यामत है तू भी ऐ 'शहज़ाद'
दुआएँ पढ़ता हुआ शहर-ए-बे-अमाँ से निकल