उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ana ka nashsha KHudi ka KHumar TuTta hai

अना का नश्शा ख़ुदी का ख़ुमार टूटता है

انا کا نشہ خودی کا خمار ٹوٹتا ہے

शायर: Qamar Raza Shahzad4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अना का नश्शा ख़ुदी का ख़ुमार टूटता है
मोहब्बतों में ख़ुद अपना हिसार टूटता है

कोई तो है जो दर-ए-खेमा-ए-मुहब्बत पर
जबीं झुकाए ब-सद इफ़्तिख़ार टूटता है

अजीब नश्शा-ए-एहसास की गिरफ़्त में हूँ
तिरे क़रीब जो आऊँ ख़ुमार टूटता है

मैं उस लहू में से हूँ जिस का एक इक क़तरा
फ़सील-ए-ज़ुल्म पे दीवाना-वार टूटता है