उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajib dukh hai labon par gila koi bhi na tha

अजीब दुख है लबों पर गिला कोई भी न था

عجیب دکھ ہے لبوں پر گلا کوئی بھی نہ تھا

शायर: Qamar Raza Shahzad5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अजीब दुख है लबों पर गिला कोई भी न था
बिछड़ते वक़्त किसी से ख़फ़ा कोई भी न था

हर एक शख़्स को सच्चे हुरूफ़ अज़बर थे
किसी के पास मगर मो'जिज़ा कोई भी न था

ब-नाम-ए-हुस्न सभी गुफ़्तुगू कमाल की थी
ये और बात सर-ए-आइना कोई भी न था

अज़ाब-ए-ज़ेहन थी इक मेहर आब-ओ-दाने पर
तिरे नगर में ख़ुशी से रहा कोई भी न था

पस-ए-ज़मीर अदालत सभी को हासिल थी
मगर ब-वक़्त-ए-ज़रूरत खरा कोई भी न था