उर्दू शायरी · ग़ज़ल

lahu na aankh se Tapka na zaKHm-e-dil ubhre

लहू न आँख से टपका न ज़ख़्म-ए-दिल उभरे

لہو نہ آنکھ سے ٹپکا نہ زخم دل ابھرے

शायर: Kailash Mahir8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लहू न आँख से टपका न ज़ख़्म-ए-दिल उभरे
भरी बहार के ये दिन बहुत गिराँ गुज़रे

वो पुर-फ़रेब निगाहें वो ए'तिमाद की मौत
न जाने ज़ेहन पे माज़ी के नक़्श क्यों उभरे

हसीन लम्हे मिरी ज़िंदगी के लौटा दे
जो आरज़ू में कटे तेरी याद में गुज़रे

जुनूँ-नवाज़ निगाहें हैं रहनुमा अपनी
न जाने क़ाफ़िला-ए-ज़िंदगी कहाँ ठहरे

सवाल-ए-तर्क-ए-वफ़ा तुम ने ख़ुद उठाया था
उदास क्यों हैं निगाहें ये बाल यूँ बिखरे

न जाने आज ही क्यों दिल की नब्ज़ डूब गई
तिरे दयार से हम यूँ तो बारहा गुज़रे

यही है जान-ए-मोहब्बत यही शुऊर-ए-वफ़ा
ज़बाँ ख़मोश निगाहों पे लाज के पहरे

क़दम क़दम पे फ़साने बनेंगे ऐ 'माहिर'
यहाँ न आँख ही भीगे न मुँह का रंग उतरे