उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dar-o-diwar se saya bhi na ubhra koi

दर-ओ-दीवार से साया भी न उभरा कोई

در و دیوار سے سایہ بھی نہ ابھرا کوئی

शायर: Kailash Mahir4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दर-ओ-दीवार से साया भी न उभरा कोई
अब तिरे शहर में होगा भी न हम सा कोई

हर दरीचे में खड़ा है कोई गौतम बन कर
घर की तन्हाई का अब नाम न लेगा कोई

वही टूटा हुआ लम्हा था मुक़द्दर अपना
जैसे जग बीत गए ख़्वाब न देखा कोई

एक दीवार थी ख़ुशबू की जो हाइल ही रही
जिस्म-दर-जिस्म मिरे सामने आया कोई