उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aaj hoga na tamasha koi hone wala

आज होगा न तमाशा कोई होने वाला

آج ہوگا نہ تماشا کوئی ہونے والا

शायर: Kailash Mahir8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आज होगा न तमाशा कोई होने वाला
जा चुका ख़ून में पोशाक भिगोने वाला

जिस से ता-हश्र रग-ए-जाँ में उजाला करते
दाग़ होता कोई बे-दाग़ न होने वाला

तक रहा हूँ बड़ी मुद्दत से बड़ी हसरत से
घर की दहलीज़ पे बैठा है खिलौने वाला

अहल-ए-ग़म सारे सिकंदर की तरफ़ लौट गए
अब सर-ए-दार चराग़ाँ नहीं होने वाला

तुम भी इस शहर में बन जाओगे पत्थर जैसे
हँसने वाला है यहाँ कोई न रोने वाला

ख़्वाब-दर-ख़्वाब है वो तीरा-शबी का 'आलम
तू भी आए तो चराग़ाँ नहीं होने वाला

मीर-ए-मंज़िल से तबाही का सबब क्या पूछें
दूर बैठा है सफ़ीने को डुबोने वाला

चादर-ए-गुल के परस्तार कहाँ हो 'माहिर'
ढूँढता है तुम्हें सहरा में बिछौने वाला