उर्दू शायरी · ग़ज़ल

be-sabab rah mein kyon aah-o-buka ki hogi

बे-सबब राह में क्यों आह-ओ-बुका की होगी

بے سبب راہ میں کیوں آہ و بکا کی ہوگی

शायर: Kailash Mahir6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बे-सबब राह में क्यों आह-ओ-बुका की होगी
ज़िंदगी हम ने कहीं तुझ से ख़ता की होगी

वही तपती हुई धरती वही उड़ते बादल
शहर-दर-शहर यही शक्ल हवा की होगी

फिर जनम लेंगे मिलन जिस्म का होगा लेकिन
वही चादर वही दीवार हया की होगी

संग-ओ-दीवार से हर शहर में रिश्ता होगा
दुश्मनी हम से मगर आब-ओ-हवा की होगी

ख़ाली ख़ाली सी मिरी तरह से बिखरी बिखरी
मिलती-जुलती यही तस्वीर ख़ला की होगी

मेरी आवाज़ पे आवाज़ न आई 'माहिर'
कोई मजबूरी इधर कोह-ए-निदा की होगी