उर्दू शायरी · ग़ज़ल

lahu ka raqs tha sanson ka irti’asha tha

लहू का रक़्स था साँसों का इर्ति’आशा था

لہو کا رقص تھا سانسوں کا ارتعاشا تھا

शायर: Lucky farooqi Hasrat5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लहू का रक़्स था साँसों का इर्ति’आशा था
मिरे बदन में कोई और बे-तहाशा था

हया के छिलके उतारे तो सुब्ह होने तक
हर एक अंग किसी रौशनी का क़ाशा था

हैं दफ़्न हाल की मिट्टी में दर्द माज़ी के
ये ज़िंदा शहर कभी मुफ़लिसी का लाशा था

उसे भी मश्क़ के मरहम ने ठीक कर डाला
मिरे ख़याल के चेहरे पे जो ख़राशा था

तनाब-ए-जिस्म पे होंटों का रक़्स-कुन कर्तब
गुज़शता शब का तमाशा भी क्या तमाशा था