उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kyun kar phirun hun ab bhi tere aas-pas main

क्यूँ कर फिरूँ हूँ अब भी तिरे आस-पास मैं

کیوں کر پھروں ہوں اب بھی ترے آس پاس میں

शायर: Kabeer Halati7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्यूँ कर फिरूँ हूँ अब भी तिरे आस-पास मैं
बरसों रहा हूँ पा के तुझे बद-हवास मैं

अब चाँद क्या सितारे भी आते नहीं नज़र
रक्खूँ भी रौशनी की कोई कैसे आस मैं

ख़ुशबू भी आस-पास भटकती नहीं मिरे
तकता हूँ एक फूल को बैठा उदास मैं

कहने को तेरे साथ रहा हूँ ऐ ज़िंदगी
लेकिन तमाम 'उम्र रहा ना-शनास मैं

साक़ी ने मय-कदे में सभी जाम भर दिए
महफ़िल में ले के बैठा हूँ ख़ाली गिलास मैं

अब इस को इत्तिफ़ाक़ कहूँ या कहूँ नसीब
तू आया मुझ को और न कभी तुझ को रास मैं

वो तो कभी क़रीब हुआ ही नहीं 'कबीर'
फिरता रहा हूँ जिस के सदा आस-पास मैं