उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chehra talashta hun main jis mehrban ka

चेहरा तलाशता हूँ मैं जिस मेहरबान का

چہرہ تلاشتا ہوں میں جس مہربان کا

शायर: Kabeer Halati9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चेहरा तलाशता हूँ मैं जिस मेहरबान का
दुश्मन बना हुआ है वही मेरी जान का

दीपक भी बन न पाया वो मेरे मकान का
सूरज समझ रहा था जिसे आसमान का

मैं 'इश्क़ 'इश्क़ पढ़ता रहा अश्क अश्क को
इक मुब्तदी हूँ मैं अभी उर्दू ज़बान का

वो सुन रहा है मेरी ख़मोशी को ग़ौर से
ये वक़्त है दर-अस्ल मिरे इम्तिहान का

घर को उसी ने नीस्त-ओ-नाबूद कर दिया
हिस्सा जिसे समझता था अपने मकान का

हम ने बना लिया है जिसे अपना राज़दार
सोचा नहीं था निकलेगा कच्चा वो कान का

काँटा समझ के मुझ से न दामन बचाइए
मैं भी कभी था फूल किसी फूल-दान का

ये और बात है कि ज़मीं पर न चल सके
हम हौसला तो रखते हैं दिल में उड़ान का

कल तक जो मेरे टुकड़ों पे पलता रहा 'कबीर'
शजरा वो पूछता है मिरे ख़ानदान का