उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kyon kah diya maine ki mujhe Dar bhi nahin hai

क्यों कह दिया मैं ने कि मुझे डर भी नहीं है

کیوں کہہ دیا میں نے کہ مجھے ڈر بھی نہیں ہے

शायर: Qamar Siddiqui5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्यों कह दिया मैं ने कि मुझे डर भी नहीं है
हाथों में मिरे आज तो पत्थर भी नहीं है

बैठा हूँ सर-ए-राह ढले शाम कहाँ जाऊँ
इस शहर में अपना तो कोई घर भी नहीं है

कश्ती को जला कर जो हो सहरा के मुक़ाबिल
मुद्दत से इन आँखों में वो लश्कर भी नहीं है

बस्ती में ख़िरद-मंदों के ये शोर है कैसा
दीवाने के हाथों में तो पत्थर भी नहीं है

अब सोच रहा हूँ ये 'क़मर' तुम से बिछड़ के
तुम सा कोई मिल जाए मुक़द्दर भी नहीं है