उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya the andeshe ki har baat pe roe hum tum

क्या थे अंदेशे कि हर बात पे रोए हम तुम

کیا تھے اندیشے کہ ہر بات پہ روئے ہم تم

शायर: Saabir Usmani6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या थे अंदेशे कि हर बात पे रोए हम तुम
'इश्क़ में कितने मक़ामात पे रोए हम तुम

आज तक मंज़िल-ए-मक़्सूद न पाई न सही
थक के बैठे न मुसाफ़ात पे रोए हम तुम

दो बदन साथ न सावन में कभी भीग सके
ख़्वाहिश-ए-मौसम-ए-बरसात पे रोए हम तुम

साथ हँसने की तमन्ना थी बहुत जिस के लिए
ख़ूब जा जा के मज़ारात पे रोए हम तुम

हम चराग़ों की तरह थे तो ये दुनिया थी हवा
अपनी क़िस्मत की सियह रात पे रोए हम तुम

लोग रोते हैं कहाँ ग़ैर के दुख में 'साबिर'
और दरख़्तों के झरे पात पे रोए हम तुम