उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya milega koi hasin na kahin

क्या मिलेगा कोई हसीं न कहीं

کیا ملے گا کوئی حسیں نہ کہیں

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या मिलेगा कोई हसीं न कहीं
जी बहल जाएगा कहीं न कहीं

है कुदूरत भरी हुई उस में
आसमाँ पर भी हो ज़मीं न कहीं

हाल पहलू बचा के लिक्खा है
ताड़ जाए वो नुक्ता-चीं न कहीं

आप की गुफ़्तुगू का क्या कहना
चार बातें भी दिल-नशीं न कहीं

ग़ैर देता है क्यों मुझे साग़र
साँप हो ज़ेर-ए-आस्तीं न कहीं

तेरे आशिक़ हैं काफ़िर-ओ-दींदार
एक हो जाए कुफ़्र-ओ-दीं न कहीं

'दाग़' फिर ताक झाँक करते हैं
अब घिरे अब फँसे कहीं न कहीं