उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya kaha phir to kaho dil ki KHabar kuchh bhi nahin

क्या कहा फिर तो कहो दिल की ख़बर कुछ भी नहीं

کیا کہا پھر تو کہو دل کی خبر کچھ بھی نہیں

शायर: Dagh Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या कहा फिर तो कहो दिल की ख़बर कुछ भी नहीं
क्यों ये क्या है ख़म-ए-गेसू में अगर कुछ भी नहीं

न बसारत न इशारत न ख़जालत न हया
तुझ में तो देखने को दीदा-ए-तर कुछ भी नहीं

आँख पड़ती है कहीं पाँव कहीं पड़ता है
सब की है तुम को ख़बर अपनी ख़बर कुछ भी नहीं

का'बे जाना भी तो बुत-ख़ाने से हो कर ज़ाहिद
दूर इस राह से अल्लाह का घर कुछ भी नहीं

ला-मकाँ में भी तो कुछ जल्वा नज़र आता है
बेकसी मैं तो उधर हूँ कि जिधर कुछ भी नहीं

इक जफ़ा तेरी जो कुछ भी नहीं तो सब कुछ है
इक वफ़ा मेरी कि सब कुछ है मगर कुछ भी नहीं

ग़ैर के वस्ल का इंकार मज़ा देता है
फिर उसी तरह कहो बार-ए-दिगर कुछ भी नहीं