उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya jaane kis azab mein main dar-ba-dar hua

क्या जाने किस 'अज़ाब में मैं दर-ब-दर हुआ

کیا جانے کس عذاب میں میں در بدر ہوا

शायर: Qamar Siddiqui7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या जाने किस 'अज़ाब में मैं दर-ब-दर हुआ
मैं चाहता नहीं था कि ये हो मगर हुआ

इक दिन हिसार-ए-जिस्म से सब को निकलना है
हो वो अमीर-ए-शहर कि दरयूज़ा-गर हुआ

इस दौर-ए-बे-हिसी का ये अंदाज़-ए-फ़िक्र है
जो है हमारा 'ऐब वो उस का हुनर हुआ

शिद्दत की धूप और थे बे-साया-दार हम
ऐसे में कौन किस का शरीक-ए-सफ़र हुआ

जो लोग मस्लहत की हवेली में क़ैद हैं
क्यों बार बार मेरा वहीं से गुज़र हुआ

मैं जब तलाश-ए-‘अज़मत-ए-माज़ी को चल पड़ा
बरगद का बूढ़ा पेड़ मिरा राहबर हुआ

सर काट कर 'क़मर' ने हथेली पे रख दिया
फिर भी न उस की बात का मुझ पर असर हुआ