उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya hue aansuon ke haar pirone wale

क्या हुए आँसुओं के हार पिरोने वाले

کیا ہوئے آنسوؤں کے ہار پرونے والے

शायर: Zafar Iqbal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या हुए आँसुओं के हार पिरोने वाले
जैसे थक-हार चुके हों मुझे रोने वाले

सुब्ह उठते हैं लिए ख़्वाब से ख़ाली आँखें
यूँ तो नादार नहीं थे कभी सोने वाले

किस तकल्लुफ़ में पड़ा हूँ मैं अगर जानता हूँ
काम ये सारे के सारे नहीं होने वाले

लोग नायाब हुए जाते हैं फूलों की तरह
कोई काँटा सा मोहब्बत का चुभोने वाले

गुज़र-औक़ात ही करते हैं बराबर वर्ना
बोरिए में वो कहाँ लुत्फ़ बिछौने वाले

काटने की यहाँ नौबत ही नहीं आती है
और बे-सूद फिरा करते हैं बोने वाले

ज़ेब-ए-तन कर के वही फिर चले आए हो 'ज़फ़र'
तुम्हें मा'लूम था कपड़े हैं ये धोने वाले