उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya hua koi sochta bhi nahin

क्या हुआ कोई सोचता भी नहीं

کیا ہوا کوئی سوچتا بھی نہیں

शायर: Yasmeen Hameed11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या हुआ कोई सोचता भी नहीं
और कहने को कुछ हुआ भी नहीं

जैसे गुम हो गई शनाख़्त मिरी
अब कोई मुझ को ढूँढता भी नहीं

जिस से रहने लगे गिले मुझ को
वो अभी मुझ को जानता भी नहीं

ऐसा ख़ामोश भी नहीं लगता
और कुछ मुँह से बोलता भी नहीं

चाहता है जवाब भी सारे
और कुछ मुझ से पूछता भी नहीं

मुस्तरद भी कभी नहीं करता
वो मिरी बात मानता भी नहीं

दाद देता है जीतने पे मुझे
और कभी मुझ से हारता भी नहीं

ख़्वाब तक मेरे छीन लेता है
और कुछ मुझ से माँगता भी नहीं

उस तरफ़ सब चराग़ जलते हैं
जिस तरफ़ कोई रास्ता भी नहीं

रात दिन पर मुहीत है तो रहे
रौशनी कोई चाहता भी नहीं

डूबते आफ़्ताब की जानिब
देर तक कोई देखता भी नहीं