उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya aa ke jahan mein kar gae hum

क्या आ के जहाँ में कर गए हम

کیا آ کے جہاں میں کر گئے ہم

शायर: Qalaq Merathi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या आ के जहाँ में कर गए हम
इक दाग़ जिगर पे धर गए हम

मेहमान-ए-जहाँ थे एक शब के
शाम आए थे और सहर गए हम

जूँ शम्अ' तमाम उम्र रोए
हर बज़्म से चश्म-ए-तर गए हम

अपनी ही नज़र नहीं वगर्ना
तू ही था उधर जिधर गए हम

नाले में असर तो क्यूँ न होता
पर तेरा लिहाज़ कर गए हम

हम जानते हैं कि तू है हम में
गो ढूँडने दर-ब-दर गए हम

झगड़ा था जो दिल पे उस को छोड़ा
कुछ सोच के सुल्ह कर गए हम

इस दश्त के ख़ार-ओ-ख़स से बच कर
जों बाद-ए-सुबुक गुज़र गए हम

थीं लुत्फ़ से दिल में जुरअतें कुछ
पर तेरे ग़ज़ब से डर गए हम

हसरत ही से हम बने थे गोया
आँख उठते ही उठते मर गए हम

देरीना रफ़ीक़ था 'क़लक़' हाए
वो क्या ही मुआ कि मर गए हम