उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchla kiye hain kitne hi lashkar zamin ko

कुचला किए हैं कितने ही लश्कर ज़मीन को

کچلا کیے ہیں کتنے ہی لشکر زمین کو

शायर: Aarif Nazeer7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुचला किए हैं कितने ही लश्कर ज़मीन को
ऐसे किया गया है बराबर ज़मीन को

मैं ने भी सैर की है कभी आसमान की
मैं जानता हूँ दश्त समंदर ज़मीन को

पैरों से धीरे धीरे खिसकने लगी है अब
कब तक रखूँ मैं यार पकड़ कर ज़मीन को

जब भी थकन से चूर हुआ सो गया हूँ मैं
चादर फ़लक को मान के बिस्तर ज़मीन को

मुझ को लिबास-ए-रूह अलग से 'अता हुआ
दफ़ना दिया गया मिरे अंदर ज़मीन को

पाताल में पड़ा हूँ मगर पुर-सुकून हूँ
मैं झाँकता रहा हूँ उछल कर ज़मीन को

दलदल को पार करना है 'आरिफ़' और उस के बा'द
रख देंगे तेरे सामने ला कर ज़मीन को