उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dekh le KHud hi koi lauT ke jate hue hath

देख ले ख़ुद ही कोई लौट के जाते हुए हाथ

دیکھ لے خود ہی کوئی لوٹ کے جاتے ہوئے ہاتھ

शायर: Aarif Nazeer9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

देख ले ख़ुद ही कोई लौट के जाते हुए हाथ
शर्म आती है ज़रा हम को बढ़ाते हुए हाथ

क्या ख़बर तुम को कि क्या दिल पे गुज़रती है मिरे
जिन से दिल मिलता नहीं उन से मिलाते हुए हाथ

तुझ को बाँहों में भरूँ छोड़ के जाने वाले
तुझ को रुख़्सत भी करूँ हाए हिलाते हुए हाथ

उस ने बर्फ़ाब से हाथों से जो थामा मुझ को
मेरे गालों पे लगी आग लगाते हुए हाथ

सब ने देखा था फ़क़त हम को बिछड़ते लम्हे
रब ने देखा था हमें साथ उठाते हुए हाथ

हम ने पकड़ा नहीं बोहतान-ज़बानों को कभी
हम ने तोड़े ही नहीं उँगली उठाते हुए हाथ

जब किया ग़ौर कभी ख़ुद की ज़बूँ-हाली पर
जिस्म की सम्त बढ़े साए से आते हुए हाथ

गिरते दुश्मन को भी हम झट से उठा लेते हैं
हम से रुकते ही नहीं हाथ बढ़ाते हुए हाथ

उस का शीशा सा बदन और मैं पत्थर 'आरिफ़'
डर तो लगता है ज़रा उस को लगाते हुए हाथ