उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh na kuchh toDne ki aadat hai

कुछ न कुछ तोड़ने की 'आदत है

کچھ نہ کچھ توڑنے کی عادت ہے

शायर: Aalim Akhtar Jaazib5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ न कुछ तोड़ने की 'आदत है
मुझ को सर फोड़ने की 'आदत है

सुब्ह उठते ही मसअला है कुछ
सुब्ह सर फोड़ने की 'आदत है

बेल की तरह चढ़ गया है वो
जो मुझे ओढ़ने की 'आदत है

गर्दनों को मिला लिया है यूँ
जूँ उन्हें मोड़ने की 'आदत है

टूटते घर में जो बड़े होंगे
उन को कब जोड़ने की 'आदत है