उर्दू शायरी · ग़ज़ल

khiDkiyon par rengti hai chandni

खिड़कियों पर रेंगती है चाँदनी

کھڑکیوں پر رینگتی ہے چاندنی

शायर: Aalim Akhtar Jaazib7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

खिड़कियों पर रेंगती है चाँदनी
किस का रस्ता देखती है चाँदनी

क़त्ल कर के दिन का ये अब आई है
झुटपुटे की जांकनी है चाँदनी

वो जो बिस्तर पर पड़ी है जाँ-बुझी
उस का चेहरा सेंकती है चाँदनी

एक बे-सुध जिस्म की दिल-जूई में
सिलवटों में घुल रही है चाँदनी

रात भर कमरे में मेरे घूम कर
थक के बस उल्टी पड़ी है चाँदनी

उस का मेरे पास आना खेल है
रात से डरती नहीं है चाँदनी

बात करती मुझ से ये पर्दों से बस
सुब्ह तक लिपटी रही है चाँदनी