उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh itni dur se di wahm ne sada mujhko

कुछ इतनी दूर से दी वह्म ने सदा मुझ को

کچھ اتنی دور سے دی وہم نے صدا مجھ کو

शायर: Zafar Iqbal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ इतनी दूर से दी वह्म ने सदा मुझ को
कि मुड़ के एक नज़र देखना पड़ा मुझ को

वो रौशनी है सफ़र में कि सूझता नहीं कुछ
सियाही दिल की दिखाती है रास्ता मुझ को

बरस गया हूँ समुंदर की लहर पर वर्ना
कहाँ कहाँ लिए फिरती रही घटा मुझ को

न शाख़ हूँ न शजर जाने किस लिए शब-भर
ख़िज़ाँ के ख़्वाब दिखाती रही हवा मुझ को

'ज़फ़र' लहू में हैं लफ़्ज़ों के जोड़-तोड़ 'अजब
छुपे हुए ने है ज़ाहिर किया हुआ मुझ को