उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh ho saqi ye tera jam-e-inayat to nahin

कुछ हो साक़ी ये तिरा जाम-ए-इनायत तो नहीं

کچھ ہو ساقی یہ ترا جام عنایت تو نہیں

शायर: Kailash Mahir4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ हो साक़ी ये तिरा जाम-ए-इनायत तो नहीं
दिल में हसरत है मगर हाथ में ताक़त तो नहीं

शाम-ए-हिज्राँ में कभी पहले उजाला न हो
शामिल-ए-दर्द कोई चश्म-ए-इनायत तो नहीं

इक उचटता सा करम भी न मयस्सर आया
अहल-ए-ग़म से तिरी नज़रों को अदावत तो नहीं

बख़्शिश-ए-आम सही तेरी निगाहों में मगर
अपना दामन कभी फैलाऊँ ये आदत तो नहीं