उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh bhi to apna nahin sara jahan hote hue

कुछ भी तो अपना नहीं सारा जहाँ होते हुए

کچھ بھی تو اپنا نہیں سارا جہاں ہوتے ہوئے

शायर: Habiba Ikram5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ भी तो अपना नहीं सारा जहाँ होते हुए
आशियाना ढूँढती हूँ आशियाँ होते हुए

ना-ख़लफ़ औलाद ने सर की रिदा भी छीन ली
आज भी मैं धूप में हूँ साइबाँ होते हुए

हर ख़ुशी हासिल है यूँ तो सारी दुनिया की मुझे
नम हैं फिर क्यों मेरी आँखें शादमाँ होते हुए

लाख हैं क़िस्मत में अपनी दर-ब-दर की ठोकरें
काम आ जाती हूँ फिर भी राएगाँ होते हुए

राज़-ए-दिल खुलता नहीं है जब किसी सूरत कभी
बोलने लगती हैं आँखें बे-ज़बाँ होते हुए