उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh bhi nahin raha hai ahd-e-wafa ki tha

कुछ भी नहीं रहा है अह्द-ए-वफ़ा कि था

کچھ بھی نہیں رہا ہے عہد وفا کہ تھا

शायर: Aamir Azher8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ भी नहीं रहा है अह्द-ए-वफ़ा कि था
दिल्ली जो शहर-ए-दिल था जो कुछ भी था कि था

साबित नहीं किसी से इक ज़ाविया कि था
साबित की हर कमी से साबित हुआ कि था

सब को मिला मसीहा सब से नहीं मिला
कुछ का तड़प के मरना इक फ़ैसला कि था

जब भी वही ख़ुदा था अब भी वही ख़ुदा
इक था ख़ुदा नहीं था इक है ख़ुदा कि था

जाते हैं सब फ़लक को आए फ़लक से कुछ
इक सिलसिला है जारी इक सिलसिला कि था

आँखें भी रक़्स में थीं रूमी भी रक़्स में
बस रक़्स रह गया है इक फ़ल्सफ़ा कि था

तेरा सराब-चेहरा सहरा-ए-वक़्त में
लगता रहा नहीं है दिखता रहा कि था

मद्धम सी रौशनी थी हल्का सा चाँद था
दिल को सुकून 'आमिर' आँसू बहा कि था