उर्दू शायरी · ग़ज़ल

badan utar ke kapDe badal raha hai koi

बदन उतार के कपड़े बदल रहा है कोई

بدن اتار کے کپڑے بدل رہا ہے کوئی

शायर: Aamir Azher6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बदन उतार के कपड़े बदल रहा है कोई
नई सरिश्त पहन कर निकल रहा है कोई

क़दम क़दम पे अंधेरा भी बढ़ता जाता है
गुमान होता है पीछे भी चल रहा है कोई

यक़ीन ही नहीं आता वो कैसे बोल पड़ा
मिरा ख़याल था बस वहम पल रहा है कोई

बड़ा गुमान है वा'दों पे टाल रक्खा है
हुज़ूर आप के टाले से टल रहा है कोई

मैं अपनी ज़ात में उतरा तो मैं ने ये देखा
बहुत ख़मोशी से बाहर निकल रहा है कोई

तमाशा आधा-अधूरा है देखिए 'आमिर'
तसव्वुरात को आँखों पे मल रहा है कोई