उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh aise jazba-e-tahqir se zamana mila

कुछ ऐसे जज़्बा-ए-तहक़ीर से ज़माना मिला

کچھ ایسے جذبۂ تحقیر سے زمانہ ملا

शायर: Zafar Akbarabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ ऐसे जज़्बा-ए-तहक़ीर से ज़माना मिला
कि उस से अपना ये ख़ुद्दार दिल ज़रा न मिला

बिछड़ के रह गए ख़ुद से जो गुम हुए उस में
हज़ार ढूँडा मगर अपना कुछ पता न मिला

वो शोर कारगह-ए-ज़िंदगी में था बरपा
कोई जवाब मुझे अपनी बात का न मिला

बला की तेज़-ख़िरामी थी हर मुसाफ़िर में
अदम की राह में कोई शिकस्ता-पा न मिला

जो लोग ज़ात के जंगल में रह गए घिर कर
उन्हें फिर उस से निकलने का रास्ता न मिला

वो बात बात का टूटा हुआ तसलसुल था
कि सिलसिले से यहाँ कोई सिलसिला न मिला

शरीक-ए-हाल रही मुस्तक़िल अता उस की
'ज़फ़र' तलब से मिरी कब मुझे सिवा न मिला