उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi surat nikalti kyon nahin hai

कोई सूरत निकलती क्यों नहीं है

کوئی صورت نکلتی کیوں نہیں ہے

शायर: Zafar Iqbal8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई सूरत निकलती क्यों नहीं है
यहाँ हालत बदलती क्यों नहीं है

हमारा इम्तिहाँ है और कितना
घड़ी सर से ये टलती क्यों नहीं है

ये बुझता क्यों नहीं है उन का सूरज
हमारी शम' जलती क्यों नहीं है

हवा रहती है क्यों अपने मुख़ालिफ़
हमारे साथ चलती क्यों नहीं है

अगर हम झेल ही बैठे हैं इस को
तो फिर ये रात ढलती क्यों नहीं है

कोई शय वाक़'ई मौजूद है तो
मिरी तह से उछलती क्यों नहीं है

मोहब्बत सर को चढ़ जाती है अक्सर
मिरे दिल में मचलती क्यों नहीं है

'ज़फ़र' जब फूलती भी है ज़ियादा
तो अपनी शाख़ फलती क्यों नहीं है