उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi naqsh kashi-o-kaba na tha

कोई नक़्श काशी-ओ-का'बा न था

کوئی نقش کاشی و کعبہ نہ تھا

शायर: Jagdeesh Jain7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई नक़्श काशी-ओ-का'बा न था
मिरे दिल में जब तक 'अक़ीदा न था

हर इक गाम पर एक मंज़िल सी थी
मिरे सामने कोई रस्ता न था

तसव्वुर में भी थी किरन आस की
अंधेरा मुकम्मल अंधेरा न था

उसे जब भी देखा तो ऐसा लगा
कि जैसे कभी उस को देखा न था

गुनाहों की पादाश भी ज़ीस्त थी
फ़क़त नेकियों ही का समरा न था

उसे हर नज़र देख पाती कहाँ
तजल्ली थी वो इक तमाशा न था

इसी ज़िद में बस वो पिलाते गए
कि पी पी के 'जगदीश' बहका न था