उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aaKHir is zist ke tufan se guzar jaana hai

आख़िर इस ज़ीस्त के तूफ़ाँ से गुज़र जाना है

آخر اس زیست کے طوفاں سے گزر جانا ہے

शायर: Jagdeesh Jain7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आख़िर इस ज़ीस्त के तूफ़ाँ से गुज़र जाना है
मौज बन कर हमें उस पार उतर जाना है

तोड़ दी मैं ने तो इस मोड़ पे ज़ंजीर-ए-नफ़स
ऐ मिरी ज़ीस्त बता तुझ को किधर जाना है

ख़्वाह तौहीन-ए-चमन हो कि हो तौक़ीर-ए-चमन
निकहत-ए-गुल को बहर-हाल बिखर जाना है

आई है शाम-ए-यक़ीं कितने तक़ाज़े ले कर
इक परिंदे की तरह हम को भी घर जाना है

मैं न लिक्खूंगा कभी 'आरिज़-ओ-लब के क़िस्से
मैं ने इस क़ैद को तौहीन-ए-हुनर जाना है

वो मिरे पास न आए न मिरे साथ चले
जिस को दो चार क़दम चल के ठहर जाना है

कोई जादा है न मंज़िल है नज़र में 'जगदीश'
अब इसी सोच में बैठा हूँ किधर जाना है